|
|
|
| एक अच्छा योद्धा, एक बेहतरीन दोस्त या प्रेमी भी हो सकता है, क्या अपने कभी सोचा है ? आज हम आपको पृथ्वीराज चौहान की एक ऐसी कहानी सुनाएंगे जो उन्हें एक अचूक निशानेबाज तो दर्शाती ही है लेकिन एक सख्त देह के भीतर एक कोमल दोस्त और प्रेमी भी छिपा होता है, यह भी बताती है। दिल्ली पर शासन करने वाले आखिरी हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान के नाम से कौन वाकिफ नहीं है। पृथ्वीराज चौहान एक राजपूत राजा थे जिन्होंने 12वी सदी में उत्तरी भारते के दिल्ली और अजमेर साम्राज्यों पर शासन किया था | पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के सिंहासन पर राज करने वाले अंतिम स्वत्रंत हिन्दू शाषक थे | राय पिथोरा के नाम से मशहूर इस राजपूत राजा ने चौहान वंश में जन्म लिया था | पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 में अजमेर में हुआ था | उनके पिता का नाम सोमेश्वर चौहान और माता का नाम कर्पूरी देवी था | राजा सोमश्वर और कर्पूरी देवी को लग्न जीवन के बारह साल बाद सन्तान प्राप्ति हुई थी। पृथ्वीराज को बचपन में ही मार देने के कई बार षड्यंत्र रचे गए थे।सदभाग्य वश पृथ्वीराज चौहान हर वार से बच गये और बड़े हो कर एक निडर और प्रसिद्ध राजा बने। पृथ्वीराज एक ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने बचपन में ही अपने हाथों से शेर का जबड़ा फाड़ दिया था। इतना ही नहीं आंखें ना होने के बावजूद अपने परमशत्रु मोहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया था। पृथ्वीराज एक महान योद्धा होने के साथ-साथ एक प्रेमी भी थे। संयोगिता और पृथ्वीराज की प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में बहुत खूबसूरती के साथ दर्ज है। लेकिन अपने बचपन के मित्र और राजकवि चंदबरदाई के साथ उनकी दोस्ती के किस्सों को बहुत ही कम लोग जानते होंगे। पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही बहुत बहादुर और युद्ध कला में निपुण थे | उन्होंने बचपन से ही शब्द भेदी बाण कला का अभ्यास किया था जिसमे आवाज के आधार पर वो सटीक निशाना लगाते थे | बात उन दिनों की है जब अपने नाना की गद्दी संभालने के लिए पृथ्वीराज ने दिल्ली का शासन संभाला था। दरअसल दिल्ली के पूर्व शासक अनंगपाल का कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद और अजमेर के महाराज सोमेश्वर चौहान से यह अनुरोध किया कि वह अपने पुत्र पृथ्वीराज को दिल्ली की सत्ता संभालने दें। सोमेश्वर चौहान ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के शासक बन गए। सन 1166 में सम्राट अनंगपाल का देहांत हो गया जिस के कारण युवराज पृथ्वीराज चौहान दिल्ली राज्य के सम्राट बन गए। 1179 में युद्ध में उनके पिता की मौत के बाद चौहान को अजमेर का उत्तराधिकारी घोषित किया गया | उन्होंने दो राजधानियों दिल्ली और अजमेर पर शाषन किया | राजा होते हुए उन्होंने अपने साम्राज्य को विस्तार करने के लिए कई अभियान चलाये और एक बहादुर योद्धा के रूप में पहचाने जाने लगे | उनके मोहम्मद गौरी के साथ युद्ध की महिमा कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी संयोगिता के पास पहुच गयी | जयचंद की ख्याति के दिनों में प्रतिद्वंदी राजपूत वंश ने खुद को दिल्ली में स्थापित कर लिया था | उस वक़्त दिल्ली पर पृथ्वीराज चौहान का राज था जो एक बहादुर और निडर व्यक्ति था | लगातार सैन्य अभियानों के चलते पृथ्वीराज ने अपना साम्राज्य राजस्थान के साम्भर , गुजरात और पूर्वी पंजाब तक फैला दिया था | उनकी लगातार बढ़ती ख्याति को देखकर शक्तिशाली शाषक जयचंद उससे इर्ष्या करने लग गया था | पृथ्वीराज के बहादुरी के किस्से देश में दूर दूर तक फ़ैल गये और वो आमजन में बातचीत का मुख्य हिस्सा बन गये थे | पृथ्वीराज की बहादुरी के किस्से जब जयचंद की बेटी संयोगिता के पास पहुचे तो मन ही मन वो पृथ्वीराज से प्यार करने लग गयी और उससे गुप्त रूप से काव्य पत्राचार करने लगी | संयोगिता के अभिमानी पिता जयचंद को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अपनी बेटी और उसके प्रेमी पृथ्वीराज को सबक सिखाने का निश्चय किया | जयचंद ने अपनी बेटी का स्वयंवर आयोजित किया जिसमे हिन्दू वधु को अपना वर खुद चुनने की अनुमति होती थी और वो जिस भी व्यक्ति के गले में माला डालती वो उसकी रानी बन जाती | एक तरफ जहां पृथ्वीराज दिल्ली की सत्ता संभाल रहे थे वहीं दूसरी ओर कन्नौज के शासक जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता के स्वयंवर की घोषणा कर दी। जयचंद ने देश के सभी बड़े और छोटे राजकुमारों को शाही स्वयंवर में साम्मिलित होने का न्योता भेजा लेकिन उसने जानबुझकर पृथ्वीराज को न्योता नही भेजा |जयचंद, पृथ्वीराज के गौरव और उनकी आन से ईर्ष्या रखता था इसलिए उसने इस स्वयंवर में पृथ्वीराज को निमंत्रण नहीं दिया। इसी दौरान कन्नौज में एक चित्रकार, बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से चित्र लेकर आया। पृथ्वीराज चौहान का चित्र देखकर सभी स्त्रियां उनके आकर्षण की वशीभूत हो गईं। जब संयोगिता ने पृथ्वीराज का यह चित्र देखा तब उसने मन ही मन यह वचन ले लिया कि वह पृथ्वीराज को ही अपना वर चुनेंगी। वह चित्रकार जब दिल्ली गया तब वह संयोगिता का चित्र भी अपने साथ ले गया था। संयोगिता की खूबसूरती ने पृथ्वीराज चौहान को भी मोहित कर दिया। दोनों ने ही एक-दूसरे से विवाह करने की ठान ली। पृथ्वीराज को भले ही निमंत्रण ना भेजा गया हो लेकिन उन्होंने उसमें शामिल होने का निश्चय कर लिया था। पृथ्वीराज का अपमान करने के उद्देश्य से जयचंद ने उन्हें स्वयंवर में तो आमंत्रित नहीं किया, लेकिन मुख्य द्वार पर उनकी मूर्ति को ऐसे लगवा दिया जैसे कोई द्वारपाल खड़ा हो। स्वयंवर के दिन जब महल में देश के कोने-कोने से आए राजकुमार उपस्थित थे तब संयोगिता को कहीं भी पृथ्वीराज नजर नहीं आए। इसलिए वह द्वारपाल की भांति खड़ी पृथ्वीराज की मूर्ति को ही वरमाला पहनाने आगे बढ़ी। जैसे ही संयोगिता ने वरमाला मूर्ति को डालनी चाहे वैसे ही यकायक मूर्ति के स्थान पर पृथ्वीराज चौहान आ खड़े हुए और माला पृथ्वीराज के गले में चली गई। अपनी पुत्री की इस हरकत से क्षुब्ध जयचंद, संयोगिता को मारने के लिए आगे बढ़ा लेकिन इससे पहले की जयचंद कुछ कर पाता पृथ्वीराज, संयोगिता को लेकर भाग गए। जयचंद और उसकी सेना ने उनका पीछा किया और परिणामस्वरूप उन दोनों राज्यों के बीच 1189 और 1190 में भीषण युद्ध हुआ जिसमे दोनों सेनाओ को काफी नुकसान हुआ |लेकिन उनका प्रेम उनके लिए सबसे बड़ी गलती बन गया। इधर संयोगिता और पृथ्वीराज खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे, वहीं जयचंद मोहम्मद गोरी के साथ मिलकर पृथ्वीराज को मारने की योजना बनाने लगा। पृथ्वीराज और जयचंद दोनों के इस लड़ाई का फायदा उठाते हुए एक अफगानी घुसपैठिया मुहम्मद गौरी ने भारत में प्रवेश कर लिया और पंजाब में घजनाविद की सेना को पराजित कर दिया | मुहम्मद गौरी ने अब पृथ्वीराज के साम्राज्य तक अपने राज का विस्तार करने का निश्चय किया | मुहम्मद गौरी ने पूर्वी पंजाब के भटिंडा के किले की घेराबंदी कर ली जो कि पृथ्वीराज का सीमान्त प्रांत था | हिन्दुओ ने हमेशा युद्ध के नियमो के अनुसार सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले दिन में लड़ाई का पालन किया लेकिन बुज्दिल मुस्लिम शासको ने सदैव रात्री को ही आक्रमण किया जब हिन्दू राजा और सैनिक उनके सैनिको के घावो का उपचार कर रहे होते है | मुहम्मद गौरी ने भी रात को अचानक आक्रमण कर दिया और पृथ्वीराज के मंत्रियों ने जयचंद से मदद की गुहार की लेकिन जयचंद ने इसका तिरस्कार करते हुए मदद करने से मना कर दिया | निडर पृथ्वीराज ने भटिंडा की तरफ अपनी सेना भेजी और 1191 में प्राचीन शहर थानेसर के निकट तराइन नामक जगह पर उसके शत्रुओ से सामना हुआ | जिद्दी राजपूतो के आक्रमण की बदोलत पृथ्वीराज ने विजय प्राप्त की और मुस्लिम सेना मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज के समक्ष छोडकर रण से भाग गयी |मुहम्मद गौरी को बेडियो में बांधकर पृथ्वीराज की राजधानी पिथोरगढ़ लाया गया और उसने पृथ्वीराज के समक्ष दया की भीख माँगी | मुहम्मद गौरी ने घुटनों के बल बैठकर उसकी शक्ति की तुलना अल्लाह से करी | भारत के वैदिक नियमो के अनुसार पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को क्षमा कर दिया क्योंकि वो एक पड़ोसी राज्य का ना होकर एक विदेशी घुसपैठिया था | बहादुर राजपूत पृथ्वीराज ने सम्मानपूर्वक मुहम्मद गौरी को रिहा कर दिया | मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की उदारता का सम्मान ना करते हुए 1192 में फिर रात को पृथ्वीराज पर आक्रमण कर दिया | मुहम्मद गौरी ने 17वी बार अपनी पहले से मजबूत सेना के साथ मध्यांतर से पहले राजपूत सेना पर आक्रमण कर पृथ्वीराज को पराजित कर दिया | इस बार पराजित पृथ्वीराज को बेडियो में बांधकर अफ़ग़ानिस्तान लाया गया | पृथ्वीराज की व्यथा यही पर खत्म नहीं हुयी | घोर में कैदी रहते हुए उसको घसीटते हुए मुहम्मद गौरी के दरबार में लाया गया और उसको मुस्लिम बनने के लिए प्रताड़ित किया गया | जब पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी के समक्ष लाया गया तो वो गौरी की आंख में आँख मिलाकर घुर रहा था | पृथ्वीराज का ये कृत्य गौरी को बहुत अपमानित लगा और उसने पृथ्वीराज को आँखे नीची करने का आदेश दिया | पृथ्वीराज ने उसको कहा कि Уआज मेरी वजह से ही तू जिन्दा है और एक राजपूत की आँखे मौत के बाद ही नीचे होती है Ф पृथ्वीराज की ये बात सुनकर गौरी आग बबूला हो गया और उसने पृथ्वीराज की आँखे गर्म सलाखों से जला देने का आदेश दिया | पृथ्वीराज की आँखे फोड़ देने के बाद कई बार उसको गौरी के दरबार में लाकर प्रताड़ित किया जाता था और उसको भारत की संस्कृति को नकली बताकर उसे गालिया दी जाती थी | उस समय पृथ्वीराज का पूर्व जीवनी लेखक चन्दवरदाई उनके साथ था और उसने पृथ्वीराज की जीवन पर पृथ्वीराज रासो नाम की जीवन गाथा लिखी थी |चन्दवरदाई ने पृथ्वीराज को उनके साथ हुए अत्याचारों का बदला लेने को कहा | उन दोनों को एक मौका मिला जब गौरी ने तीरंदाजी का खेल आयोजित किया | चन्दवरदाई की सलाह पर पृथ्वीराज ने गौरी से इस खेल में सामिलित होने की इच्छा जाहिर की | पृथ्वीराज की ये बात सुनकर गौरी के दरबारी खिक खिलाकर हंसने लगे कि एक अँधा कैसे तीरंदाजी में हिस्सा लेना चाहता है | पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी से कहा कि या तो वो उसे मार दे या फिर खेल में हिस्सा लेने दे | चन्दरवरदाई ने पृथ्वीराज की और से गौरी को कहा कि एक राजा होने के नाते वो एक राजा के आदेश की मान सकता है | मुहम्मद गौरी के जमीर को चोट लगी और वो राजी हो गया | बताये हुए दिन गौरी अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था और पृथ्वीराज को मैदान में लाया गया | पृथ्वीराज को उस समय पहली बार बेडियो से मुक्त किया गया | गौरी ने पृथ्वीराज को तीर चलाने का आदेश दिया | उनकी सहायता करने के लिए चंद्रवरदाई ने भी दोहों की सहायता से पृथ्वीराज को गोरी की बैठकी समझाई - "चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ठ प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको रे चौहान" पृथ्वीराज ने बाण चलाया जिससे मोहम्मद गोरी धाराशायी हो गया। कहते हैं दुश्मन के हाथ से मरने से अच्छा है किसी अपने के हाथ से मरा जाए। बस यही सोचकर चंद्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर अपनी दोस्ती का बेहतरीन नमूना पेश किया। जब संयोगिता को इस बात की खबर मिली तब वह भी एक वीरांगना की तरह सती हो गई। गौरी के मंत्रियों ने पृथ्वीराज के शव को हिन्दू रीती रिवाजो के अनुसार क्रियाकर्म नही करने दिया और मुहम्मद गौरी की कब्र के नजदीक उनके शव को दफना दिया | उन्होने पृथ्वीराज की कब्र पर थूकने और अपमानित करने की परम्परा नही छोड़ी जो आज भी वहा प्रचलित है | इस तरह एक महान हिन्दू शासक का अंत हुआ और इसके बाद अगले 700 वर्ष तक भारत मुस्लिमो के अधीन रहा जब तक की ब्रिटिश सरकार नही आयी | |