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पढ़िए महान चक्रवर्तीन सम्राट अशोक की कहानी

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अशोक बिंदुसार और सुभद्रांगी का पुत्र और महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र था | अशोक की माँ धर्म का आचरण करती थी, इसलिए उन्हें धर्मा के नाम से भी जाना जाता था | बालक के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में माँ का योगदान सर्वाधिक होता है। विश्व इतिहास के पहले महान सम्राट अशोक इसके अपवाद नहीं थे। धर्मा विदुषी और सुंदरी थी | अशोक के ओजस्वी व्यक्तित्व की निर्मात्री भी वही होती है और उसे सिंहासन दिलाने वाली भी वही बनती है | बौद्ध ग्रन्थ दीपवंश में बिन्दुसार की 16 पत्नियों एवं 101 पुत्रों का जिक्र है। बिंदुसार ने अपने सभी पुत्रों को आचार्य चाणक्य द्वारा निर्धारित गुरुकुल प्रणाली के माध्यम से बेहतरीन शिक्षा देने की व्यवस्था की थी।

लेकिन उन सभी पुत्रो में अशोक सबसे श्रेष्ठ और बुद्धिमान था।अशोक बचपन से अत्यन्त मेघावी था। अशोक की गणना विश्व के महानतम् शासकों में की जाती है। अशोक का पूरा नाम Уअशोक वर्धन मौर्याФ था। अशोक का अर्थ है Ц बिना शोक का यानि जिसे कोई दुःख न हो कोई पीड़ा न हो । अशोक ने बाद में देवनंपिय पियदसी यानि Уदेवताओं का प्रिय और प्रेम से देखने वालाФ की पदवी ले ली। राजवंश परिवार के होने के कारण, सम्राट अशोक युद्ध में बचपन से ही निपुण थे। साथ ही वे तलवारबाजी, शिकार में भी बहुत निपुण थे। कहा जाता है उनमे इतना बल था कि वह एक लकड़ी की छड़ी से ही एक सिंह को मार डालने कि क्षमता रखते थे।

सुशीम बिंदुसार और महारानी चारुमित्रा का सबसे बड़ा पुत्र था | सुशीम बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशीला में कीचक नाम के प्रान्तपाल द्वारा हुए विद्रोह को दबाने में असक्षम रहा। जिसके बाद बिंदुसार ने अशोक को तक्षशीला भेजा और अशोक वहाँ शांति स्थापित करने में सफल रहा। अशोक अपने पिता के शासनकाल में ही प्रशासनिक कार्यों में सफल हो गया था। अशोक की इन्ही उपलब्धियों को देखते हुए बिंदुसार ने अशोक से प्रसन्न होकर 18 साल की उम्र में अशोक को उज्जैन के एक प्रान्त अवंती का प्रान्तपाल नियुक्त कर दिया था। तक्षशिला का विद्रोह दबाने के बाद अशोक की अगला राजा बनने की सम्भावना बढ़ गयी, जिससे परेशान होकर बड़े भाई सुशीम ने राजा बिन्दुसार द्वारा उसे दो साल के देश निकाला दिला दिया।

कहा जाता है, भाइयों के साथ गृहयुद्ध के बाद अशोक को राजगद्दी मिली। बिंदुसार के सभी पुत्रो में सुशीम सबसे क्रूर और राक्षशी प्रवत्ति का था | जिसने धोखे से अशोक की माँ धर्मा की हत्या की थी | जब अशोक को अपनी माँ की हत्या  का पता चला तो अशोक ने सुशीम को बड़ी बेरहम और निर्मम तरीके से मार दिया | 272 इसा पूर्व में अशोक के पिता बिन्दुसार की मृत्यु हुई, उसके पश्चात दो वर्ष तक अशोक और उसके सौतेले भाइयों के बिच घमासान युद्ध चला। दो बौद्ध ग्रन्थ; दिपवासना और महावासना के अनुसार, अशोक नें सिंहासन पर कब्ज़ा करने के लिए अपने 99 भाइयों को मार गिराया और मात्र विटअशोक जो की अशोक का सगा भाई था को बक्श दिया। माना जाता है कि अशोक ने अपने कई भाइयो को मारा क्योकि वे गलत और अधर्मी थे और सुशीम के समर्थक थे, किन्तु उसने सभी भाईयों की हत्या नहीं की | उसके कई भाइयो में से एक तिष्य नाम का छोटा भाई भी शामिल था, जिसे उसने मगध साम्राज्य के कई प्रान्तों की बागडोर सँभालने को दे दी थी |

उसी समय 272 इसा पूर्व में अशोक सिंहासन तो चढ़ा, परन्तु उसका राजभिषेक 269 इसा पूर्व में हुआ और वह मौर्य साम्राज्य का तीसरा सम्राट बना।

अपने शाशन काल के दौरान वह अपने साम्राज्य को भारत के सभी उपमहाद्वीपों तक बढ़ने के लिए लगातार 8 वर्षों तक युद्ध करते रहे।

अशोक की पहली पत्नी देवी एक बौद्ध व्यापारी की पुत्री थी। जिससे अशोक को पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा प्राप्त हुए। देवी कभी भी राजधानी पाटलिपुत्र नहीं गयी। महेद्र और संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तरदायी माना जाता है। कहा जाता है की जब अपने भाइयों की शत्रुता से सम्राट अशोक दूर रहे तब उन्हें रानी कौर्वकी से प्रेम हुआ, जोकि कलिंग के राजा की पुत्री थी | चुकी कलिंग प्रारम्भ से ही मगध का शत्रु रहा है| इसी वजह से रानी कौर्वकी और अशोक का मिलन नही हो सका | अशोक की प्रधान रानी का नाम असंध्मित्रा था जो एक राज-परिवार से थी और अपना पूरा जीवन प्रमुख रानी बन कर रही। हालांकि, इस रानी से अशोक को कोई संतान नहीं थी।

अशोक अपने राजवंश का तीसरा राज करने वाले महान राजा था जिसने लगभग भारत के सभी महाद्वीपों पर राज किया। अशोक नें बाल्य काल से ही यह निश्चय कर लिया था कि वह अपने साम्राज्य को और भी ज्यादा विस्तृत करेंगे और अंत के समय वह इस कार्य को करने में सफल भी हुआ। अशोक ने प्रशाश्कीय क्षेत्र में जिस त्याग, दानशीलता तथा उदारता का परिचय दिया एवं मानव को नैतिक स्तर उठाने की प्रेरणा दी वो विश्व इतिहास में कहीं और देखने को नही मिलती है। अशोक ने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये अनेक सुधार किये और अनेक धर्म-महापात्रों की नियुक्ति की। अशोक अपनी जनता को अपनी संतान की तरह मानता था। उसने जनहित के लिये प्रांतीय राजाओ को नियुक्त किया। अशोक के छठे लेख से ये स्पष्ट हो जाता है कि वो कुशल प्रशासक था। उसका संदेश था Ц "प्रत्येक समय मैं चाहे भोजन कर रहा हूँ या शयनागार में हूँ, प्रतिवेदक प्रजा की स्थिति से मुझे अवगत करें। मैं सर्वत्र कार्य करूंगा प्रजा हित मेरा कर्तव्य है और इसका मूल उद्योग तथा कार्य तत्परता है।"

अशोक की योग्यता का ही परिणाम था कि उसने 40 वर्षों तक कुशलता से शासन किया, यही वजह है कि सदियों बाद; आज भी लोग अशोक को एक अच्छे शाशक के रूप में याद करते हैं।

माना जाता है कि बौद्ध धर्म अपनाने से पहले अशोक भगवान् शिव का उपासक था। कहते है की सुशीम के पुत्र ने अशोक को बोद्ध धर्म पर जाने का मार्ग प्रशस्त किया | अशोक युद्ध के लिये इतना प्रसिद्ध नही हुआ जितना एक धम्म विजेता के रूप में प्रसिद्ध हुआ। वह न केवल मानव वरन सम्पूर्ण प्राणी जगत के प्रति उदारता का दृष्टीकोण रखता था। इसी कारण उसने पशु पक्षियों के वध पर प्रतिबंध लगा दिया था। अशोक ने लोकहित के लिये छायादार वृक्ष, धर्मशालाएं बनवाई तथा कुएं भी खुदवाये। उसने मनुष्यों व पशुओं के लिये उपयोगी औषधियों एवं औषधालयों की व्यवस्था की थी। अपने साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा तथा दक्षिण भारत से व्यापार की इच्छा हेतु एवं आचार्य चाणक्य के अखंड भारत के स्वप्न को पूरा करने हेतु अशोक ने 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया। युद्ध बहुत भीषण हुआ। इस युद्ध में अशोक को विजय हासिल हुई। जिसका विवरण अशोक के तेरहवें शिलालेख में अंकित है। विजयी होने के बावजूद अशोक इस जीत से खुश नही हुआ क्योंकि इस युद्ध में नरसंहार का ऐसा तांडव हुआ जिसे देखकर अशोक का मन द्रविभूत हो गया। युद्ध की भीषणता का दिलो-दिमाग पर ऐसा असर हुआ कि अशोक ने युद्ध की नीति का सदैव के लिये त्याग कर दिया। उसने दिग्विजय की जगह धम्म विजय को अपनाया। उसने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि कलिंग की जनता के साथ पुत्रवत् व्यवहार किया जाये तथा सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार हो। उसने अपने आदेश को शिलालेख पर लिखवाया। ये आदेश धौली व जोगदा शिलालेखों पर अंकित है। कलिंग के युद्ध के बाद सम्राट अशोक के व्यवहार में अद्भुत परिवर्तन हुआ और कलिंग युद्ध उसका अंतिम सैन्य अभियान था। अशोक की इस शान्ति प्रिय निती ने उसे अमर बना दिया। अशोक ने अपने शासन काल में बंदियों की स्थिति में भी सुधार किये। उसने वर्ष में एक बार कैदियों को मुक्त करने की प्रथा का प्रारंभ किया था। अशोक ने राज्य का स्थाई रूप से दौरा करने के लिये व्युष्ट नामक अधिकारी नियुक्त किये थे। कलिंग विजय के पश्चात अशोक का साम्राज्य विस्तार बंगाल की खाड़ी तक हो गया था। नेपाल तथा कश्मीर भी मगध राज्य में थे। दक्षिण में पन्नार नदी तक साम्राज्य विस्तृत था। उत्तर पश्चिम में अफगानिस्तान व बलूचिस्तान भी अशोक के साम्राज्य का हिस्सा था।

जीवन के उत्तरार्ध में अशोक भगवान बुद्ध की मानवतावादी शिक्षाओं से प्रभावित होकर बौद्ध हो गये और उन्ही की स्मृति मे उन्होने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल के लुम्बिनी मे मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रुप मे देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया।

विश्व के कई देशों में भगवान बुद्ध के विचारों को लोगों तक पहुँचाने और बौद्ध धर्म का जोर शोर से प्रचार करने के कारण अशोक का नाम पुरे विश्व भर में प्रसिद्द है।

कहा जाता है दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में सम्राट अशोक नें भगवान बुद्ध के अवशेषों को संग्रह करके रखने के लिए कुल 84000 स्तूप बनवाएं।

उसने Уअशोक चक्रФ जिसको धर्म का चक्र भी कहा जाता था, बनवाया | जोकि आज के भारत के तिरंगे के मध्य में मौजूद है। मौर्य साम्राज्य के सभी बॉर्डर में 40-50 फीट ऊँचा अशोक स्तम्भ अशोक द्वारा स्थापित किया गया था। अशोक नें चार आगे पीछे एक साथ खड़े सिंह का मूर्ति भी बनवाई थी जो की आज के समय में भारत का राजकीय प्रतिक हैं। आप इस मूर्ति को भारत के सारनाथ म्यूजियम में देख सकते हैं। अशोक के शासन काल में ही कई प्रमुख विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी, जिसमे तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय प्रमुख हैं। तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया मध्य प्रदेश में साँची का स्तूप आज भी एक प्रसिद्द पर्यटक स्थल है।

अशोक का जीवन काल भारत इतिहास का बहुत ही गौरवशाली समय कहा जाता है। अखंड भारत की स्थापना करने वाले प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र और सम्राट बिंदुसार के दुसरे पुत्र अशोक ही मौर्य वंश के आखरी शासक हुए | इतिहास की बात करे तो गुप्तवंश या जिसे मौर्यवंश भी कहते हैं भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य हुआ | मौर्यवंश के दौरान ही भारत अपने स्वर्णिम दौर में था और जब सम्राट अशोक ने राज्य संभाला तो भारत उस वक्त दुनिया का सबसे समृद्ध देश हुआ करता था | अर्थशास्त्री कहते हैं कि सम्राट अशोक के शासन के दौरान भारत की अर्थ व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में 35% की भागीदारी रखती थी | लेकिन सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद भारत का पतन शुरू हुआ और मुग़ल एवं अग्रेज़ों के समय तक 1947 में मात्र 4% तक रह गयी |

सम्राट अशोक की मृत्यु कैसे हुई और कहा हुई यह बात अभी तक एक रहस्य के रूप में दबी हुई हैं | कई इतिहासकार के अनुसार सम्राट की मृत्यु तक्षशिला में हुई, वही कई का कहना हैं कि सम्राट अशोक पाटलीपुत्र में अपनी अंतिम सांस लिए थे | कुछ लोगो का कहना है की सम्राट अशोक की मृत्यु 232 इसा पूर्व में 72 वर्ष कि उम्र में एक शांति और कृपालु राजा के रूप में हुई। अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य लगभग 50 और वर्षों तक चला। इसके आखिरी शासक का नाम ब्रह्द्रत था जिसे 185 बीसी में जनरल पुष्यमित्र संगा ने मार डाला था।

कहते हैं कि सम्राट अशोक ने ही अपनी सभा में नौ रत्न रखने की परंपरा की शुरुआत की थी, जिसका पालन आगे कई राजा भी करने लगे | सबसे प्रसिद्ध मुग़ल राजा अकबर ने सम्राट अशोक की कई नीतियों को अपने शासनकाल में अपनाया था | नौ रत्न की इस परंपरा में रहने वाले लोग कई तरह के विचारक और विद्वान हुआ करते थे, जो राजा को सुशासन के लिए मार्गदर्शन करते थे लेकिन वे सभी नौ लोग पूरी तरह से गुप्त होते थे | सम्राट अशोक अपने शासनकाल में नौ रत्नों से मिली हर तरह की जानकारी या ज्ञान को एक पुस्तक में दर्ज़ करवा लेते थे ताकि आगे यदि आवश्यकता पड़ने पर उस ज्ञान का इस्तेमाल किया जा सके | लेकिन वह पुस्तक भी हर किसी पहुच से दूर थी | सम्राट अशोक द्वारा बनाये गए नौ रत्नों का यह समूह पूरी दुनिया में सबसे शक्तिशाली समूह था | इसमें उपस्थित नौ व्यक्ति के आगे दुनिया का कोई भी व्यक्ति, राज्य या देश टिक नहीं पाता था | सम्राट अशोक के सुशासन और उनकी ऊँची सोच के चलते ही उनके शासनकाल में जातिवाद जैसी कोई प्रथा नहीं थी | शासन की दृष्टि में सभी एकसमान थे |

इतिहास के अनुसार सम्राट अशोक का शासनकाल लगभग 40वर्ष से भी अधिक का था, इस हिसाब से वह बहुत कम उम्र में राजा बने थे | हालांकि सम्राट अशोक के दादा सम्राट चन्द्रगुप्त मोर्य भी बहुत कम उम्र में राजा बन गए थे लेकिन अखंड भारत का सम्राट बनने में उन्हें कुछ समय लगा था | वही अशोक जब सम्राट बने तब वह युवक ही थे इसलिए वह सबसे युवा सम्राट कह लायें |

इतिहास में ऐसे कई रहस्य है जो भारत में बाहर से आये आक्रान्ताओं ने बदल दिए लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता हैं कि भारत का वह दौर स्वर्णिम दौर था |

मौर्यवंश और सम्राट अशोक का दौर ही ऐसा दौर था जब भारत सचमुच में Уसोने की चिड़ियाФ कहलाया था |


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